अपने ज़िद के पर्दों को
मेरी ख्वाहिशों की खिड़कियों से हटाओ,
मंज़िल की उम्मीद नहीं करता तुमसे, पर कुछ वक्त यूं ही राहों में तो साथ आओ !!
अपने ज़िद के पर्दों को
मेरी ख्वाहिशों की खिड़कियों से हटाओ,
मंज़िल की उम्मीद नहीं करता तुमसे, पर कुछ वक्त यूं ही राहों में तो साथ आओ !!
सियासी गुरूर तुम पर कुछ
यूं सिर चढ़ बोलता है,
कि ज़िक्र से भी हमारे
लहू तुम्हारा खौलता है,
इन्सानियत के कत्ल-ए-आम
को माना तुम ना बचा पाए,
हैरानियत तो इस पर है कि
तुम मरहम भी न लगा पाए,
अपने बेशर्मी के कम्बलों
को सीने से हटाते,
कुछ वक्त के लिये ही सही
हमारे तम्बुओं में तो आते,
वो रन्गीं शामें तो तुम्हें
खूब भायी होंगी,
पर क्या खबर कि तुम्हें
हमारी याद भी आयी होगी,
वहां तुम्हारे जश्न-ए-रात
की सुबह न होती होगी,
यहां हमारी काली रातों
की सुबह न होती है,
वो सफ़ेद चादर कोहरे की
रातों में जो छाती है,
कफ़न बन के हमारे आंखों
के 'नूर' को ओढ़ाती है,
सांसे सहमी न होती हमारी
एक बार तुमने पुकारा तो होता,
उजड़ा आशियां तो दो पल में
बनता गर एक हाथ तुम्हारा भी होता,
पर शायद पानी तुम्हारी
आंखों का सूख गया है,
तुम पर यकीन भी हमारा
टूट सा गया है !!
( अगस्त-सितम्बर 2013 में उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर दन्गों में सैकड़ों जानें गयीं, कई सैकड़ों लोग घायल हुए और हज़ारों की संख्या में लोग बेघर हुए, इससे भी बुरे हालात तब हुए जब दन्गों के बाद राहत कैम्पों की बदहाल हालत की ओर प्रशासन की उदासीनता बनी रही, नतीजन दिसम्बर 2013 और जनवरी 2014 में 33 से ज्यादा (एक रिपोर्ट के मुताबिक) बच्चों की मृत्यु हुई।
'बेशर्मी' मैने जनवरी 2014 में लिखी जिसे आज आपके समक्ष रख रहा हूं ।
'बेशर्मी' एक प्रयास है उन राहत कैम्पों की हालत दर्शाने का और श्रद्धांजली है उन बच्चों को जिनकी मृत्यु राहत कैम्पों में सर्दी के कारण हुई। )
कभी किनारों से खौफ़ था मुझे,
पर आज तेरे ख्यालों के साहिलों
से नाता है मेरा,
कभी जुबां पर लाने
से कतराता था,
पर आज हर सांस
पर नाम है तेरा,
कभी मुझे तेरे लिये दो लफ़्ज़
भी ज़्यादा लगते थे,
पर आज तुझपर
किताब भी कम लगती है,
शायद ये तेरी सोहबत
का सुरूर है,
पर ग़म-ए-इश्क ये भी कि
तू मुझसे दूर है !!
तेरी बातों की खुश्बू फ़िर
मन की हवाओं में आयी है,
वक्त की धूप में अब
शायद तेरी यादें ही
मेरी ज़िंदगी की परछाई है !
ज़िक्र जो तेरा जब होता है,
मुस्कुराहटों का सावन
लबों से बरसता है,
तेरे संग ज़िंदगी में
इक मदहोशी सी
लगती है,
बिना तेरे खामोशी सी
रहती है,
हर जुस्तज़ू बिन तेरे
अधूरी है,
यादों में संग है
पर अभी भी दूरी है,
लम्हा वहीं थम जाता है..
मन तेरे ही खयालों में होता है,
ज़िक्र जो तेरा जब होता है !!
कुछ यूं कहूं, सामने तुम्हारे
मेरे लफ़्ज नहीं निकलते,
ज़िंदगी की शाम यूं ही बीतती है,
तेरी यादों के लम्हों में ढलते,
आरजू तो बहुत कुछ कहने की है,
पर उन रस्तों पर कभी
तुम नही मिलती,
कभी हम नही मिलते !
उन लम्हों से गुज़री
हर याद,
अब अंजानी सी
लगती है !
सोचता हूँ लिखूँ
नज़्म तुझपे,
पर 'नज़्म' पर नज़्म लिखना,
बात बेमानी सी लगती है!