Showing posts with label शहर. Show all posts
Showing posts with label शहर. Show all posts

Monday, March 2, 2015

बेशर्मी

सियासी गुरूर तुम पर कुछ
यूं सिर चढ़ बोलता है,
कि ज़िक्र से भी हमारे
लहू तुम्हारा खौलता है,

इन्सानियत के कत्ल-ए-आम
को माना तुम ना बचा पाए,
हैरानियत तो इस पर है कि
तुम मरहम भी न लगा पाए,

अपने बेशर्मी के कम्बलों
को सीने से हटाते,
कुछ वक्त के लिये ही सही
हमारे तम्बुओं में तो आते,

वो रन्गीं शामें तो तुम्हें
खूब भायी होंगी,
पर क्या खबर कि तुम्हें
हमारी याद भी आयी होगी,

वहां तुम्हारे जश्न-ए-रात
की सुबह न होती होगी,
यहां हमारी काली रातों
की सुबह न होती है,

वो सफ़ेद चादर कोहरे की
रातों में जो छाती है,
कफ़न बन के हमारे आंखों
के 'नूर' को ओढ़ाती है,

सांसे सहमी न होती हमारी
एक बार तुमने पुकारा तो होता,
उजड़ा आशियां तो दो पल में
बनता गर एक हाथ तुम्हारा भी होता,

पर शायद पानी तुम्हारी
आंखों का सूख गया है,
तुम पर यकीन भी हमारा
टूट सा गया है !!

( अगस्त-सितम्बर 2013 में उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर दन्गों में सैकड़ों जानें गयीं, कई सैकड़ों लोग घायल हुए और हज़ारों की संख्या में लोग बेघर हुए, इससे भी बुरे हालात तब हुए जब दन्गों के बाद राहत कैम्पों की बदहाल हालत की ओर प्रशासन की उदासीनता बनी रही, नतीजन दिसम्बर 2013 और जनवरी 2014 में 33 से ज्यादा (एक रिपोर्ट के मुताबिक) बच्चों की मृत्यु  हुई।

'बेशर्मी' मैने जनवरी 2014 में लिखी जिसे आज आपके समक्ष रख रहा हूं ।

'बेशर्मी' एक प्रयास है उन राहत कैम्पों की हालत दर्शाने का और श्रद्धांजली है उन बच्चों को जिनकी मृत्यु राहत कैम्पों में सर्दी के कारण हुई। )

Monday, November 17, 2014

वो शहर...

कुछ ने कहा कि वो हिंदू था,
कुछ ने कहा वो मुसलमान था,
पर किसी ने ये न कहा
कि वो भी इंसान था,

ज़मीर सियासतदारों का
उस वक्त सो रहा था,
और इन्सानियत कोने में
बैठा रो  रहा था,

कभी जिन्होंने मनाई थी
एकसाथ ईद और दिवाली,
उन्होंने ही भर दी थी
एक दूसरे के लहू से नाली,

एक पल भी न सोचा था
कि होगा अंजाम इस तरह,
कल तक जो कहते थे भाई
करेंगे कत्ले-आम इस तरह,

अमन की आंखों के वो
सपने टूट चुके थे,
इज्जत वो उस शहर कि
वो लूट चुके थे,

अब बाकी न कोई निशां था,

कई ज़िन्दगियां तबाह हुई थी
उस शाम-ओ -सहर में ,
क्या मिला था तुझे
ओ राम ,ऐ रहीम आपस में
मचाये इस कहर में,

क्या मिला तुझे, जिनकी
बातों में तू आया था,
तुझे इन्सानियत के खिलाफ़
भड़काया था,

क्या यही तेरी कौम ने
तुझको सिखाया था ?