तेरी बातों की खुश्बू फ़िर
मन की हवाओं में आयी है,
वक्त की धूप में अब
शायद तेरी यादें ही
मेरी ज़िंदगी की परछाई है !
Thursday, February 26, 2015
परछाई...
Wednesday, February 25, 2015
ज़िक्र जो तेरा जब होता है.…
ज़िक्र जो तेरा जब होता है,
मुस्कुराहटों का सावन
लबों से बरसता है,
तेरे संग ज़िंदगी में
इक मदहोशी सी
लगती है,
बिना तेरे खामोशी सी
रहती है,
हर जुस्तज़ू बिन तेरे
अधूरी है,
यादों में संग है
पर अभी भी दूरी है,
लम्हा वहीं थम जाता है..
मन तेरे ही खयालों में होता है,
ज़िक्र जो तेरा जब होता है !!
Tuesday, February 24, 2015
कुछ यूं कहूं………
कुछ यूं कहूं, सामने तुम्हारे
मेरे लफ़्ज नहीं निकलते,
ज़िंदगी की शाम यूं ही बीतती है,
तेरी यादों के लम्हों में ढलते,
आरजू तो बहुत कुछ कहने की है,
पर उन रस्तों पर कभी
तुम नही मिलती,
कभी हम नही मिलते !
....बात बेमानी सी लगती है !
उन लम्हों से गुज़री
हर याद,
अब अंजानी सी
लगती है !
सोचता हूँ लिखूँ
नज़्म तुझपे,
पर 'नज़्म' पर नज़्म लिखना,
बात बेमानी सी लगती है!
Monday, November 17, 2014
वो शहर...
कुछ ने कहा कि वो हिंदू था,
कुछ ने कहा वो मुसलमान था,
पर किसी ने ये न कहा
कि वो भी इंसान था,
ज़मीर सियासतदारों का
उस वक्त सो रहा था,
और इन्सानियत कोने में
बैठा रो रहा था,
कभी जिन्होंने मनाई थी
एकसाथ ईद और दिवाली,
उन्होंने ही भर दी थी
एक दूसरे के लहू से नाली,
एक पल भी न सोचा था
कि होगा अंजाम इस तरह,
कल तक जो कहते थे भाई
करेंगे कत्ले-आम इस तरह,
अमन की आंखों के वो
सपने टूट चुके थे,
इज्जत वो उस शहर कि
वो लूट चुके थे,
अब बाकी न कोई निशां था,
कई ज़िन्दगियां तबाह हुई थी
उस शाम-ओ -सहर में ,
क्या मिला था तुझे
ओ राम ,ऐ रहीम आपस में
मचाये इस कहर में,
क्या मिला तुझे, जिनकी
बातों में तू आया था,
तुझे इन्सानियत के खिलाफ़
भड़काया था,
क्या यही तेरी कौम ने
तुझको सिखाया था ?
Saturday, November 8, 2014
लिखुंगा तेरे बारे में ऐ ज़िंदगी……
सोचता हूँ लिखुंगा तेरे
बारे में भी ऐ ज़िंदगी ,
संघर्षों की धूप में ,
सफलताओं की छांव में ,
असफल पीड़ा के रुप में ,
प्रयत्निक छाले भरे पांव में ,
सत्य स्वप्नों की अभिलाषा में ,
मानसिक शांति की पिपासा में ,
रम सा गया हूँ,
पर लिखुंगा तेरे बारे में भी.………
आशा के उजालों में ,
निराशा के अंधकार में ,
मंज़िलों के लंबे रस्तों में ,
उम्मीदों से लदे बस्तों में ,
कर्तव्यों की तल्लीनता में ,
काल की विहीनता में,
थम सा गया हूँ ,
पर सोचता हूँ, एक दिन
लिखुंगा तेरे
बारे में भी ऐ ज़िंदगी !!
Wednesday, November 5, 2014
ज़िंदगी का दरिया......
ज़िंदगी का दरिया ये जो
बहता है,
अक्सर ही मुझसे कुछ
कहता है,
इसके लफज़ों में कुछ
खास है,
अपनेपन का वो हसीं
एहसास है,
तन्हाइयों की लहरें जब
इन पर आती हैं,
जज़्बातों को अपने संग
बहा ले जाती हैं,
उम्मीदों की आवाज़ें जब
साहिलों तक जाती है,
उन बातों , एह्सासों को
गहराई तक पहुंचाती है,
सपनों की रौशनी दरिये
पर जो पड़ती है ,
झिल्मिलाहट और चमक
उसकी और बढ़ती है,
मेरे इरादों के पत्थर अब
टूट जाये
ये मुमकिन नहीं लगता,
दरिया ये चन्द नाकामियों
से सूख जाये
अब मुमकिन नहीं लगता ।।